
सोचता हूँ कभी ...यूँही कभी-कभी...
सावन आता तो है,पर अब हँसता नहीं..
बादल छाकर भी अब तो बरसता नहीं
कैसे दीवाने... वो पागल अफसाने..
संगी, वो साथी ,वो यार पुराने
दिल करता है सबको पॉकेट में रख लूँ ।
बच्चा बनाकर के बाँहों में ढँक लूँ
सोचता हूँ कभी ...यूँही कभी-कभी....
खयालो के आँगन में गूंजे तराने-
बचपन के दिन थे वो कितने सुहाने !
कोई न जाने जब तक जियेंगे ,
कितने ही साथी मिलकर बिछड़ेंगे।
आंसू पी-पी कर भी अच्छे से हूँ मैं,
उम्र के तूफानी रस्ते पे हूँ मैं!
सोचता हूँ कभी ...यूँही कभी-कभी
उलझी-उलझी सी रातें और उलझे से दिन हैं...
वो दिल ही क्या दिल है जो यादों के बिन है...!
जब जिंदगी में यारो का संग है...
जीने की खुशबू हंसने का रंग है....
यादों के मखमल की चादर लपेटू ,
खुशियाँ बिखेरूं और दर्द समेटूं ...
सोचता हूँ कभी ...
यूँही कभी-कभी....
well i think ...achi kavita likh lete ho..keep it up..:)
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