Friday, August 24, 2012

बारिश बुलाती है ....!


बारिश बुलाती है.....!
बारिश बुलाती है
खिडकियों से मुझे
फिर अपने अनगिनत आँसू  बताने आई  है
वो कहानियों में भी बहती है
कविताओं में छनकती  है
और ग़ज़ल में एक दरिया बन जाती है
बारिश बुलाती है

स्याही से लिपट कर
जिसकी खुशबु
सौन्धी कविता बनती है
हर शब्द महकती है
अक्सर मेरे तकिये पर सो जाती है

वो अनकही बातें कहती
अपलक मुझे देखती है
वो बारिश .....
जिसे सुनते हुए
डायरी अन्तराल चिन्हों से भर जाती है
( उन्ही बातो से जिसे कोई नही कह पाता
में भी नही )
फिर भी वो बुलाती है! 

No comments:

Post a Comment