Monday, July 30, 2012

ये बारिशें भी ..!



संग दर्द कितने लायीं हैं..!
ये बारिशें भी ..!
कितने रोती हैं ......
ये बारिशें भी ..!

बूंद- बूंद छू लो कभी,
कभी बहने दो दिन- रात,
आज उदास,
तो कल नाराज़..
ये बारिशें भी ..!

बन गयी यादों की परछाई  सी,
मेरे साथ अकेली है पुरवाई   भी।
हाथ पकड़कर ले जाती कहीं,
 ये बारिशें भी ..!

आता पतझड़



थकी दोपहर की सुस्तायी हवा,
पेड़ की घनी छाया से पत्तियों को हिलाती ,
धुप ने गहने उतारकर कोटर में रख दिए  थे।
हम तुम वही तो मिले थे ।

तुम्हारे वोइलिन के तारों पर वो सुखी पत्ती ,
जाने कैसे आ गिरी थी
उसी आम के नीचे ,
जहाँ ठंडक सो रही थी ।
और न जाने कितनी यादें -
सीप में मोती की तरह -आज भी हैं - मेरे दिल में ।

आज फिर वहीँ
वह पतझड़ आया है
तुम्हारी यादों  को लेकर ,
आता हुआ पतझड़...
सौगात लाया है
रिश्ते की डोर मजबूत करने की ...
तुम्हारे साथ आँख -मिचौली खेलने की ।

Friday, July 27, 2012

बस तुम्हारा नाम ..!!


यादों के कोहरे में
बर्फ़ से ढकी
दिल की शाखों पर
बस तुम्हारा नाम है।

पनीली आँखों से
 आंसुओ को निकालती
पलकों की सलाखों पर
बस तुमारा नाम है।

झील के किनारे
बासंती गुलमोहर के
चटकीले फूलों पर
बस तुम्हारा नाम है।

बाग़ की कुर्सियों पर
 भोर से ठहरी
ओस की बूंदों पर
बस तुम्हारा नाम है।

ढ़लती हुई शाम के
लाल रंग से रचे
मेहँदी के हाथों पर
बस तुम्हारा नाम है।

सर्द सुबह
 बर्फ़ीली झील में तैरती
नाव  की पतवारों पर
बस तुम्हारा नाम है।

बस तुम्हारा नाम ......!!

Monday, July 23, 2012

देहरी के दीप


तुम  जब  तक  नहीं आये
सांसों में सैलाब था
तुम जब तक नहीं आये
धडकनें अग्नि में तपती  रहीं
अब जो तुम आये हो
मैं मोम सा पिघल रहा हूँ

मेरा आप मुझसे पूछता था
 क्या होगा अब
तब नजरें शून्य से बंधीं थीं
और मैं मौन था

डगमगाते हुए सूरज ने
आखिरी लौ बुझाई
आसमान की चादर धुंधला गयी
पंछी घर लौटने लगे
अँधेरा बढ़ते बढ़ते आँगन तक आ गया
मेरी आँखों के आंसू
और देहरी के दीप जलने लगे