थकी दोपहर की सुस्तायी हवा,
पेड़ की घनी छाया से पत्तियों को हिलाती ,
धुप ने गहने उतारकर कोटर में रख दिए थे।
हम तुम वही तो मिले थे ।
तुम्हारे वोइलिन के तारों पर वो सुखी पत्ती ,
जाने कैसे आ गिरी थी
उसी आम के नीचे ,
जहाँ ठंडक सो रही थी ।
और न जाने कितनी यादें -
सीप में मोती की तरह -आज भी हैं - मेरे दिल में ।
आज फिर वहीँ
वह पतझड़ आया है
तुम्हारी यादों को लेकर ,
आता हुआ पतझड़...
सौगात लाया है
रिश्ते की डोर मजबूत करने की ...
तुम्हारे साथ आँख -मिचौली खेलने की ।
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