तुम जब तक नहीं आये
सांसों में सैलाब था
तुम जब तक नहीं आये
धडकनें अग्नि में तपती रहीं
अब जो तुम आये हो
मैं मोम सा पिघल रहा हूँ
मेरा आप मुझसे पूछता था
क्या होगा अब
तब नजरें शून्य से बंधीं थीं
और मैं मौन था
डगमगाते हुए सूरज ने
आखिरी लौ बुझाई
आसमान की चादर धुंधला गयी
पंछी घर लौटने लगे
अँधेरा बढ़ते बढ़ते आँगन तक आ गया
मेरी आँखों के आंसू
और देहरी के दीप जलने लगे
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